Wednesday, August 26, 2009

इस हफ्ते का सवाल

WHAT IS THE FOLLOWING?

SHAKUNADE SHAKUNADE KAZAYE, AATI NIIKA SHAKUNAM BOLYA DAINA, BAZAN SHANKH......

Monday, August 10, 2009

कुछ तस्वीरे हवाई की

हवाई मे बीत १० दिनों के बारे मे लिखने का मन है। कई चीजे एक साथ थी, अमेरिकन सोसाइटी ऑफ़ प्लांट बायोलोजी की मीटिंग मे अचानक जे सी बोस पर एक पोस्टर, पुराने दोस्तों, सहपाठियों से मुलाक़ात, और खासकर उनके बच्चों से, और बालकोनी से झांकता समंदर, और कई चीजों के घालमेल मे डूबे १० दिन। फिलहाल कुछ तस्वीरे.



Tuesday, July 14, 2009

Fellowships

I found following sites, which may be useful for the students, academicians in the country.

1. http://www.scholarshipsinindia.com/awards_competitions_in_india.html

2. http://www.ucost.in/sciencecongress.html

best wishes, Prem

Monday, May 11, 2009

पंडित छन्नूलाल मिश्र के दिव्य स्वर में दिगंबर होली




भाई प्रेम ने पंडित छन्नूलाल मिश्र की दिगंबर होली का ज़िक्र किया तो मैंने 'रेडियोवाणी' पर इसके आडियो का लिंक टिप्पणी में दे दिया , स्वप्नदर्शी का सुझाव है कि मैं आडियो यहीं क्यों न लगा दूँ। इन दोनो मित्रों के सानिध्य में इस तीसरे नैनीताली को आलसीपने के लगभग स्थायी भाव को त्यागना ही पड़ा. तो आइए सुनते है पंडित छन्नूलाल मिश्र के दिव्य स्वर में दिगंबर होली...

होली (शिव जी की)

ये होली पंडित मिश्रा के स्वर में सुनी थी बहुत साल पहले, सीधे बनारस से लाइव:
पेश है:
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खेलैं मसाने में होरी दिगंबर खेले मसाने में होरी
भूत पिशाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी.
लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के,
चिता, भस् भर झोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी.
गोप गोपी श्याम राधा, ना कोई रोक ना, कौनाऊ बाधा
ना साजन ना गोरी,
‍‍ना साजन ना गोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी.
नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी
पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी.
भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज की गोरी
धन-धन नाथ अघोरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी.

Wednesday, May 6, 2009

बारिश मे गुजरते हुए

बारिश और बारिश
धुंध और कोहरे के दिन
बहुत पुराना रिश्ता है
धुंध, कोहरे और बारिश से मेरा
बारिश मे ये शहर एक शहर नही रहता
समय और काल के पार घुलमिल जाता है
कई दूसरे शहरो से .....................


कभी बारिश मे गुजरते हुए
कई बारिशो की याद युं उठ आती है अचानक
जैसे पहली बारिश के बाद
उठ आती थी मिट्टी की खुशबू
सील जाती थी माचीस की तीली
और बंद पड़े डिब्बे मे चीनी .....


या सर उठाती है इच्छा
गरमागरम चाय की
या फ़िर जैसे जहन मे देर सबेर
कौंध जाती है
एक मटमैली नदी
और पंक्तिया उन कविताओ की
जो मुडी-तुडी शक्ल मे
किसी जेब से निकलती थी ....................

बारिश के बीच बारिश की स्मृति
कुछ यु भी आती है
जैसे बचते-बचाते
चप्पल के नीचे जाता था एक केचुआ
जीवन और मृत्यु
पाप और पुण्य का फैसला सुनाने
और एक लिजलिजापन भीतर तक उतर जाता था......

बारिश के बीच याद आती है,
बहुत सी सर्द और गर्मजोशी से
लबालब मुलाकाते
और वों बहुत से दोस्त
जिनका पता -ठिकाना खो गया है..................


और बारिश के बाद के बहुत सुकूनदेह है
घुले-घुले और धुले से सन्नाटे मे
गीली धुप और वों कुछ ठहरे हुए पल
जो स्मृति से उबर गए है
और भागम-भाग से बचे हुए है.....