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Tuesday, February 9, 2010

राह बस एक








खोजते - खोजते
बीच की राह
सब कुछ हुआ तबाह।


बनी रहे टेक
राह बस एक।


Thursday, June 26, 2008

लोहाघाट से अखिलेश दुबे की दो कवितायें

(सुदूर पहाड़ों में स्कूल न जा पाने वाली एक बच्ची मुनिया और स्कूल जाने वाले बच्चे नन्दू के ये दो काव्याभासित रूप दरअसल उस विसंगति को सामने लाते हैं, जो उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढांचे से बावस्ता हैं।)


मुनिया

शीत से फटे लाल गालों,
उलझे बालों और अपने बहुत कम अंतर वाले भाई -बहनों को संभालती मुनिया
स्कूल की घंटी की आवाज सुनकर मुश्किल से अपने आंसू रोक पाती है

घर के पास से गुजरती सर्पीली पगडंडियों से
अपनी पीठ पर स्कूल का बस्ता लादे जाते गांव के हमउम्र बच्चों को देखकर
दूर आसमान में खो जाती है
उसे रंग-बिरंगी किताबें और शरारत करते छोटे-छोटे बच्चों के सपने आते हैं
सपनों में वो फूल-सी हलकी
आकाश नापती अपनी दुश्वारियों से बेखबर घर से बहुत दूर उड़ आती है

तभी उसकी पैदाइश को कोसती उसकी मां उसके सिरहाने नजर आती है
मुनिया अपनी जिम्मेदारियों का बोझ लिए उठ खड़ी होती है
बचपन के निशान ढूंढती !


नन्दू

नन्दू को बार-बार अपनी पाठशाला और मास्टर के सपने आते हैं
वह नींद में चौंकता और कराहता है

मास्टर अपनी घनी मूंछ में चुटकी भर हंसता है
और नन्दू उस हंसी के सामने अपनी समूची निरीहता के साथ
जिबह होते बकरे की तरह अवाक प्रस्तुत हो जाता है

नन्दू जब भी अपनी पाठशाला की बिखरी छवि को सहेजना चाहता है
कुछ टूटता है उसके अंदर
और उसकी आवाज कांपने लगती है

नींद में भी नन्दू खामोश हो जाता है !

Sunday, December 30, 2007

शहर ,बर्फ और कविता

शहर में सर्दियों का मौसम है
हवा में नमी है
धूप में खुशनुमा उदासी है
अभी बस अभी बर्फ गिरने ही वाली है
और शहर चुपचाप सो रहा है.

सो रही है झील
सो रहे हैं पहाड़.
मेरा शहर जागती आंखों में सो रहा है.
शहर की आंखों में एक नींद है
जो जाग रही है
शहर की आंखों में एक सपना है
जो सो रहा है.

आजकल लगभग आधा शहर
हल्द्वानी की तरफ नीचे उतर गया है
बस बच गई है नींद
बच गये हैं सपने.

बच्चे घरों में कैद हैं
उनके स्कूल की युनिफार्म्
छत पर धूप में सूख रही है
और किताब-कापियों के बीच
छुट्टियों की बर्फ भर गई है
जो शायद फरवरी के बाद ही पिघलेगी.

औरतों का वक्त
अब चुप्पी को सुनते हुये गुजरता है
आश्चर्य है कि वे फिर भी जी रही हैं

मर्द लोगों के पास
बातें है,किस्सें है,किताबें हैं,शराब है
और वे अलाव की तरह सुलग रहे हैं

लड़कियां
अपनी कब्रगाहों में निश्शब्द दफ्न हैं
उनके पास देखने के लिये
ग्रीटिन्ग कार्डस और सपने हैं
उनके पास बोलने को बहुत कुछ है
लेकिन वे जाडों के बाद बोलेंगी.

सोने दो शहर को
वह लोरी और थपकियों के बिना भी
लम्बी-गहरी नींद सो सकता है
मेरा शहर कोई जिद्दी बच्चा नहीं है.

Friday, December 21, 2007

बात नैनीताल की

(यह ग़ज़ल हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि बल्ली सिंह चीमा की है |२ सितम्बर १९५२ को अमृतसर जिले के चीमाखुर्द गांव में जन्मे बल्ली भाई किसान कवि हैं | उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं|वे नैनीताल की तराई में रहते हैं | उनके तीसरे संग्रह 'तय करो किस ओर हो'के फ्लैप पर सुप्रसिद्ध आलोचक अवधेश प्रधान ने लिखा है-" वह अपनी धरती को बेहद चाहने वाला कवि है ; नैनीताल और तराई का सहज नैसर्गिक सौन्दर्य और उसके प्रति कवि का गहरा लगाव गजलों में उतर आया है|"

अब यहां पल में वहां कब किस पे बरसें क्या खबर ,
बदलियां भी हैं फरेबी यार नैनीताल की |

लोग रोनी सूरतें लेकर यहां आते नहीं ,
रूठना भी है मना वादी में नैनीताल की |

अर्द्धनंगे जिस्म हैं या रंगबिरंहगी तितलियां ,
पूछती है आप ही से 'माल'* नैनीताल की |

ताल तल्ली हो कि मल्ली चहकती है हर जगह,
मुस्कराती और लजाती शाम नैनीताल की |

चमचमाती रोशनी में रात थी नंगे बदन ,
झिलमिलाती , गुनगुनाती झील नैनीताल की |

खूबसूरत जेब हो तो हर नगर सुन्दर लगे ,
जेब खाली हो तो ना कर बात नैनीताल की |

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1 नैनीताल की माल रोड

Friday, December 14, 2007

नैनीताल - घूमना बस घूमना

ये कविता हमारे मित्र सिद्धेश्वर सिंह् ने ईमेल से भेजी है, कुछ तकनीकी दिक्कतों के चलते अभी वो सीधा पोस्ट नही कर पा हे है.

क्या लिखें क्या ना लिखें इस हाल में,
लोग कितने अजनबी हैं शहर नैनीताल में।
कोहरे मे डूबा हुआ है चेहरा दर चेहरा,
वादी जैसे गुमशुदा है सुन्दर मायाजाल में ।
इस सड़क से उस सड़क तक घूमना बस घूमना ,
इक मुसलसल सुस्ती- सी है इस शहर की चाल में ।
धूप में बैठे हुये दिन काट देतें हैं यहां ,
कौन उलझे जिन्दगी के जहमतो- जंजाल में ।
आज के हालात का कोई जिकर होता नहीं ,
किस्से यह कि दिन थे अच्छे शायद पिछले साल में ।
इस शहर का दिल धड़कता है बहुत आहिस्तगी से,
इस शहर को तुम न बांधो तेज लय- सुर - ताल में । *
सिद्धेश्वर सिंह्