Thursday, December 3, 2009

रानीखेत से हिमालय: शिरीष कुमार मौर्य


शिरीष के नए कविता संग्रह "पृथ्वी पर एक जगह" कुछ महीनो पहले
शिल्पायन प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। कुछ बेहतर कविताएं उनके ब्लॉग अनुनाद
पर भी पढी जा सकती है. इसी किताब में हिमालय के ऊपर एक बेहद सहज शब्दावली में बेटे से बातचीत के जरिये हिमालय को समझने की एक कवि की कोशिश है, जिसमे विज्ञान का भी मिथक की तरह इस्तेमाल है। फैक्ट्स, मिथक और जड़ो से जुड़ाव के संयोजन से निकली ये कविता शायद शिरीष के बस की ही है, इतने सरल शब्दों में कह देना। (किताब के लिए संपर्क का पता है :10295, lane #1, West Gorakhpark, Shahdara, Delhi-110032, Phone;9810101036/011-22821174).

(बेटे से कुछ बात)

वे जो दिखते हैं शिखर
नंदाघुंटी -पंचाचूली-नंदादेवी-
त्रिशूल वगैरह
उन पर धूल राख और पानी नहीं
सिर्फ बर्फ गिरती है

अपनी गरिमा में निश्छल सोये-से
वे बहुत बड़े और शांत
दिखते हैं

हमेशा ही बर्फ नहीं गिरती थी
उन पर
एक समय था जब वे थे ही नहीं
जबकि
बहुत कठिन है उनके होने की कल्पना
अक्षांशों और देशांतरों से भरी
इस दुनिया में

कभी वहां
समुद्र था नमक और मछलियों और एक छूंछे उत्साह से भरा
वहां समुद्र था
और बहुत दूर थी धरती
पक्षी जाते थे कुछ साहसी इस ओर से उस ओर
अपना प्रजनन-चक्र चलाने
समुद्र उन्हें रोक नहीं पाता

फिर एक दौर आया
जब दोनों तरफ की धरती ने
आपस में मिलने का फैसला किया
समुद्र इस फैसले के खिलाफ था
वह उबलने लगा
उसके भीतर कुछ ज्वालामुखी फूटे
उसने पूरा प्रतिरोध किया
धरती पर दूर-दूर तक जा पहुंचा लावा
लेकिन
यह धरती का फैसला था
इस पृथ्वी पर दो-तिहाई होकर भी रोक नहीं सकता था
जिसे समुद्र
आखिर वह भी तो एक छुपी हुई धरती पर था

धरती में भी छुपी हुई कई परतें थीं
प्रेम करते हुए हृदय की तरह
वे हिलने लगीं
दूसरी तरफ़ की धरती की परतों से
भीतर-भीतर मिलने लगीं
उनके हृदय मिलकर बहुत ऊचे उठे
इस तरह हमारे ये विशाल और अनूठे
पहाड़ बने

यह सिर्फ भूगोल या भूगर्भ-विज्ञान है
या कुछ और ?

जब धरती अलग होने का फैसला करती है
तो खाइयां बनती हैं
और जब मिलने का तब बनते हैं पहाड़

बिना किसी से मिले
यों ही इतना ऊचा नहीं उठ सकता कोई
जब ये बने
इन पर भी राख गिरी ज्वालामुखियों की
छाये रहे धूल के बादल
सैकड़ों बरस

फिर गिरा पानी
एक लगातार अनथक बरसात
एक प्रागैतिहासिक धीरज के साथ
ये ठंडे हुए

आज जो चमकते दीखते हैं
उन्होंने भी भोगे हैं
प्रतिशोध
भीतर-भीतर खौले हैं
बर्फ सा जमा हुआ उन पर
युगों का अवसाद है

पक्षी अब भी जाते हैं यहां से वहां
फर्क सिर्फ इतना है
पहले अछोर समुद्र था बीच में
अब
रोककर सहारा देते
पहाड़ हैं!


2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

खूबसूरत कविता के साथ
पुस्तक चर्चा बढ़िया रही!

Devendra said...

जब धरती अलग होने का फैसला करती है
तो खाइयां बनती हैं
और जब मिलने का तब बनते हैं पहाड़

बिना किसी से मिले
यों ही इतना ऊचा नहीं उठ सकता कोई
--आपने हिमालय से जीवन का सबसे बड़ा सच बता दिया
जीवन भर याद रहेगी यह सीख।