Monday, November 17, 2008

कुछ पुराने भूले -बिसरे नाम: नैनीताल की यादे

जब ये ब्लॉग शुरू किया था तो कुछ इसी तरह का विचार था की ये महज एक ब्लॉग न रहे, बल्कि नैनीताल से जुड़े हुए लोगो के संस्मरणों का एक संकलन हो। इसीलिये किसी जल्दबाजी के तहत इस ब्लॉग पर नियमित पोस्ट डालने की कोई बाध्यता नही है। कुछ मित्र जुड़े, जो कभी-कभार कुछ लिख देते है, फ़िर चुप्पी साध कर बैठ जाते है।, पर जितना भी लिखते है, बेहतर लिखते है। एक तरह से ये ब्लॉग हमारे अपने समय का और अपने जीवन का दस्तावेज़ है। इसी की कड़ी में आज आपके साथ फ़िर से प्रोफेस्सर तेजेंद्र गिल के कुछ संस्मरण बांटते है, जो मुझे एक व्यक्तिगत ईमेल के तहत प्राप्त हुए है, पर उनकी इजाज़त से इसे यहाँ ब्लॉग पर प्रकाशित किया जा रहा है।

इसी बहाने प्रोफ़ेसर गिल की कुछ बातें मुझे भी याद है। आज १८ साल बाद भी उनकी जो छवि मन में आयी, वो मेरी यादों में कुछ इस तरह से है, बेहद सलीके से मरून पगडी बांधे और अक्सर नीले या फ़िर काले सूट में , बेहद सज्जन रॉब-दाब वाले प्रोफ़ेसर। बेहद अच्छे चित्र ब्लेकबोर्ड पर क्लास शुरू होने के पहले ही बने रहते थे। और एक बड़ी अच्छी लिखावट और उम्दा चित्रकारी करते हुए, जिस तरह से प्रोफ़ेसर गिल पढाते थे, वो लाज़बाब तरीका था। इस तरह से पढाते हुए मेने कोई दूसरा प्रोफ़ेसर नही देखा। दूसरा ज़ज्बा भी था, उनका, चाहे जो हो, पर अपना पठाय्कर्म पूरा कराने का, जो यूनिवर्सिटी में हड़तालों के चलते, नैनीताल की ठण्ड में दो महीने के अवकाश के चलते, अकसर पूरा नही हो पाता था। पर फ़िर भी चाहे कोलेज बंद हो जाय, लगातार लंबे लेक्चर (तीन घंटे तक बिना रुके) लेकर भी , इतवार के दिन भी , प्रोफेस्सर गिल पढाते थे।

एक मर्तबा उन्होंने हम लोगो को ९ बजे से १२.३० तक पढाना शुरू किया, और पूरी क्लास भूखी -प्यासी इतने बड़े अन्तराल में थक गयी, और ऊपर से दिसम्बर की ठण्ड, और पूरा कोलेज बंद। अंतत: बोलने की हिम्मत किसी की नही हुयी, तो सबने एक साथ लकडी के फर्श पर पैर बजाने शुरू कर दिए। शायद मुझे कभी दुबारा मौका न मिले। इसीलिये, आज में प्रोसेस्सर गिल का तहेदिल से उन दिनों के लिए धन्यवाद भी करना चाहती हूँ। शायद उन लेक्चर्स में से मुझे आज कुछ भी याद नही है, पर काम के प्रति उनकी निष्ठा, का सबक दूर तक प्रेरणा का सबक बना रहेगा ।

-नैनीताली

अब प्रोफ़ेसर गिल की कुछ यादे यहाँ............................

--------तेजेंद्र गिल

Those are the old times now but were probably the best times in my life..........! Having lived in Naini Tal for almost four decades, I have an emotional attachment to the place and the people of that beautiful city. That is the reason I keep surfing the web looking for what is going on in Naini Tal. Just the other day looked at the picture of Dr.Ajay Rawat organizing an event at the flats Malli Tal. Oh man, the time flies fast and people begin to look different than what they looked like in 1963-65, when we were undergraduates, full of energy and coursing through the bajars of Talli Tal and Malli Tal, and of course, the famous mall road. It was then that I had first known Dr.D.D.Pant, and thereafter, never forgot that great man. He inspired me so much that I can not even describe, and I was just a student then. It was 10 years later that he offered me the position because he knew me very well through my college years. I was moved when I read about his passing away, but then I felt good that a great man had personally known me and that I had an opportunity to serve under his direction (him being the Principal and later the Vice Chancellor). I hope we still have the people who measure up to the stature of Dr.D.D.Pant, Dr.S.S Khanna (my mentor), Dr.O.N.Perti (Chemistry), Dr.R.K. Mehrotra (Botany), Dr.Gunju (Proctor). I am sure the youth of Naini Tal is still as motivated as before and that the region is progressing. Read about the aerators being installed in the lake, something that should have been done in 1960s and 70s but as long as the lake survives the human and/or environmental onslaught, it is good news. The place must have changed significantly in the 14 years that I have been out here.......!

1 comment:

bahadur patel said...

bahut achchha kar rahe hain aap.