Thursday, June 26, 2008

लोहाघाट से अखिलेश दुबे की दो कवितायें

(सुदूर पहाड़ों में स्कूल न जा पाने वाली एक बच्ची मुनिया और स्कूल जाने वाले बच्चे नन्दू के ये दो काव्याभासित रूप दरअसल उस विसंगति को सामने लाते हैं, जो उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढांचे से बावस्ता हैं।)


मुनिया

शीत से फटे लाल गालों,
उलझे बालों और अपने बहुत कम अंतर वाले भाई -बहनों को संभालती मुनिया
स्कूल की घंटी की आवाज सुनकर मुश्किल से अपने आंसू रोक पाती है

घर के पास से गुजरती सर्पीली पगडंडियों से
अपनी पीठ पर स्कूल का बस्ता लादे जाते गांव के हमउम्र बच्चों को देखकर
दूर आसमान में खो जाती है
उसे रंग-बिरंगी किताबें और शरारत करते छोटे-छोटे बच्चों के सपने आते हैं
सपनों में वो फूल-सी हलकी
आकाश नापती अपनी दुश्वारियों से बेखबर घर से बहुत दूर उड़ आती है

तभी उसकी पैदाइश को कोसती उसकी मां उसके सिरहाने नजर आती है
मुनिया अपनी जिम्मेदारियों का बोझ लिए उठ खड़ी होती है
बचपन के निशान ढूंढती !


नन्दू

नन्दू को बार-बार अपनी पाठशाला और मास्टर के सपने आते हैं
वह नींद में चौंकता और कराहता है

मास्टर अपनी घनी मूंछ में चुटकी भर हंसता है
और नन्दू उस हंसी के सामने अपनी समूची निरीहता के साथ
जिबह होते बकरे की तरह अवाक प्रस्तुत हो जाता है

नन्दू जब भी अपनी पाठशाला की बिखरी छवि को सहेजना चाहता है
कुछ टूटता है उसके अंदर
और उसकी आवाज कांपने लगती है

नींद में भी नन्दू खामोश हो जाता है !

3 comments:

advocate rashmi saurana said...

vha bhut sundar rachanaye. likhate rhe.
aap apna word verification hata le taki humko tipani dene me aasani ho.

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा रचनायें हैं.

nainitaali said...

कविता अच्छी है, पर जीवन इतना निराशा भरा भी नही है. सुदूर पहाड मे भी बच्चे (लड्किया और लडके दोनो) कई मील चलकर स्कूल जाते है. कम से कम प्राईमरी स्कूल तक और चिठी लिखने लायक लडकियो को बनाने का सपना हमारी, नानी-दादी की पीढी ने अपने पहाड मे देखा था.

इसीलिये मुनिया मेरे हिसाब से पहाड की बच्ची की प्रतिनिधी नही है. मुझे खुद मेरे दादा कन्धे पर बिठा कर 4 मील दूर प्राईमरी स्कूल ले जाते थे, बेहद मामूली पहाडी किसान.

नन्दु वाला मामला मुझे लगता है, कि ज्यादा सही तस्वीर है, हमारे स्कूलो की, और खुद एक भुक्त भोगी के बतौर, मै एक सिरे से अध्यापक के लिये जो सामंती सम्मान है, उसे खारिज़ करने की पक्षधर हूँ. बच्चो के साथ मार-पीट, गाली-गलोज़, और किसी भी मायने मे उनके आत्म विश्वास के लिये घातक किसी भी हरकत के लिये जिम्मेदार अध्यापक को मुज़रिम करार और उसकी सजा मिलनी चहिये.

पर जन जाग्रिति, लोगों की हर स्तर पर भागेदारी, और हमारी बेसिक सोच मे मुल्य परिवर्तन की. जो समाज जितना जाहिल होता है, वो कम्ज़ोर वर्ग, जिसमे, बच्चे, बूढे, और स्त्री है, के प्रति क्रूर होता है. हिन्दुस्तान का समाज सबसे ज्यादा इन्ही के लिये ...